एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन

फसल सुरक्षा के क्षेत्र में समन्वित किट प्रबंध एक ऐसी नई समन्वित तकनीक है , जिसमे पर्यावरण को प्रदुषण से बचाने तथा फसल संरक्षण की पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है.

एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन के मुख्य घटक

  1. गहरी जुताई
  2. खरपतवारों का निष्कासन
  3. बीज एवं पौध उपचार
  4. किट-रोग प्रतिरोधी प्रजातियों का प्रयोग
  5. जल प्रबंधन
  6. उर्वरक प्रबंधन
  7. मृदा प्रबंधन
  8. फसल चक्र अपनाना
  9. फसलों की कटाई के बाद अवशेष पदार्थों को सड़ाने का उचित प्रबंधन करना
  10. समकालिक रोपण
  11. उचित बीज दर एवं पौध अंतरण
  12. प्रकाश प्रपंच फेरोमोन ट्रैप इत्यादि द्वारा कीड़ों की उपस्तिथि का पता लगाना
  13. हानिकारक कीड़ो के अण्डों एवं सुड़ियों का एकत्र नष्ट करना
  14. रोगग्रस्त पौधों का निष्कासन
  15. ट्राइकोग्रामा , काइसोपा एवं एन पी पी जैसे परजीवी , परभक्षी एवं रोग जनक को खेतों में छोड़नाएकीकृत नाशीजीव प्रबंधनफसल सुरक्षा के क्षेत्र में समन्वित किट प्रबंध एक ऐसी नई समन्वित तकनीक है , जिसमे पर्यावरण को प्रदुषण से बचाने तथा फसल संरक्षण की पद्धतियों का प्रयोग किया जाता हैएकीकृत नाशीजीव प्रबंधन के मुख्य घटक
    1. गहरी जुताई
    2. खरपतवारों का निष्कासन
    3. बीज एवं पौध उपचार
    4. किट-रोग प्रतिरोधी प्रजातियों का प्रयोग
    5. जल प्रबंधन
    6. उर्वरक प्रबंधन
    7. मृदा प्रबंधन
    8. फसल चक्र अपनाना
    9. फसलों की कटाई के बाद अवशेष पदार्थों को सड़ाने का उचित प्रबंधन करना
    10. समकालिक रोपण
    11. उचित बीज दर एवं पौध अंतरण
    12. प्रकाश प्रपंच फेरोमोन ट्रैप इत्यादि द्वारा कीड़ों की उपस्तिथि का पता लगाना
    13. हानिकारक कीड़ो के अण्डों एवं सुड़ियों का एकत्र नष्ट करना
    14. रोगग्रस्त पौधों का निष्कासन
    15. ट्राइकोग्रामा , काइसोपा एवं एन पी पी जैसे परजीवी , परभक्षी एवं रोग जनक को खेतों में छोड़ना

लाभ

  1. पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाता है
  2. समुदायिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है
  3. आर्थिक रूप से लाभकारी है

कीटनाशक दवाओं के प्रयोग में सावधानियाँ

 

  1. जहाँ तक संभव हो सके घोल मिट्टी या टीन के बर्तनों में बनाया जाय और प्रयोग के बाद उन्हें खाने पिने वाली चीजों के काम में कदापि न लाया जाय ।
  1. घोल प्रयोग करने वाले व्यक्तियों के हाथ आदि कटे-फटे नहीं होने चाहिए ।
  1. घोल बनाने के लिए निश्चित पानी की मात्रा को एक साथ दवा में नहीं मिलाना चाहिए बल्कि पहले थोड़े पानी में अच्छी तरह घोलकर शेष पानी बाद में मिलाना चाहिए ।
  1. किसी दवा के प्रयोग के बाद प्रयोगकर्ता को चाहिए की वह साबुन से हाथ-पैर आदि को भली भाँति धो डाले ।
  1. किसी भी कीटनाशक दवा को खाद्य पदार्थ , सब्जी आदि के समीप नहीं रखना चाहिए । दवा को सुरक्षित रखकर उस पर “विष या जहर” आदि शब्द लिखकर बच्चों व मवेशियों से दूर रखना चाहिए ।
  1. प्रयोगकर्ता को चाहिए की दिन भर काम करने के बाद उन्ही कपड़ों को पहनकर न सोयें तथा ऐसे स्थान पर सोयें जहा कीटनाशक दवाइयां न रखी हों ।
  1. दवा का छिड़काव करते समय यह ध्यान रखना चाहिए की दवा आँख , नांक , कान , मुँह आदि पर न पड़े । प्रयोग के बाद साबुन या साफ पानी से हाथ पैरों को अच्छी तरह धो डालना चाहिए ।
  1. कोई व्यक्ति यदि इन दवाओं के जहर से प्रभावित हों जाए तो उसे शीघ्र चिकित्स्क के पास ले जाएं ।
  1. धूल वाली कीटनाशक दवाओं को प्रातः अवं घोल वाली दवाओं को पानी में घोलकर ओस समाप्त होने के बाद प्रयोग करना चाहिए ।

उर्वरकों का कुशल प्रयोग कैसे करे ?

 

  1. उर्वरकों का प्रयोग मृदा परिक्षण के आधार पर भूमि की किस्म , फसलों की किस्म तथा भौगोलिक परिस्थितियाँ आदि को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए । मिट्टी की जाँच करने से यह पता चलता है की भूमि में किस तत्त्व की कमी या अधिकता है और उसी के आधार पर उपयुक्त उर्वरकों का चुनाव करके कमी वाले तत्वों की पूर्ति की जा सकती है । इस कार्य से अनावश्यक तत्वों के उपयोग से बचा सकते है तथा उत्पादन की लागत कम की जा सकती है ।
  2. उर्वरकों का प्रयोग संतुलित मात्रा में करे जिससे मृदा उर्वरता एवं उत्पादकता बनी रहे ।
  3. उर्वरकों की सही समय पर , सही विधि द्वारा , उचित गहराई पर प्रयोग करें जिससे पोषक तत्वों का हासृ न हों तथा वे समुचित मात्रा में फसलों को प्राप्त हों सकें ।
  4. फास्फेटिक एवं पौटेशिक उर्वरकों का फसलोत्पादन में अमूल्य योगदान है । फास्फोरस जड़ो की वृद्धि एवं विकास तथा पोषक तत्वों की प्राप्यता को बढ़ाता है तथा पोटाश दानों की वृद्धि एवं विकास तथा पौधों को विभिन्न किट एवं बिमारियों से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है । अतः इन उर्वरकों के प्रयोग में किसी प्रकार की कमी न करें ।
  5. फसल-चक्र में दलहनी फसलों का समावेश किया जाये , जिससे नाइट्रोजन यौगिकीकरण क्रिया द्वारा वायुमण्डलीय नाइट्रोजन पौधों को प्राप्त हों सके ।
  6. रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग के साथ जैविक खादें ( गोबर की खाद , कम्पोस्ट एवं हरी खाद आदि ) तथा जीवाणु उर्वरकों ( जैसे राइजोबियन , एजेटोबैक्टर , नील हरित शैवाल आदि ) के प्रयोगे पर बल दिया जाना चाहिए , जिससे मृदा भी बनी रहेगी तथा साथ ही साथ मृदा में जीवश की मात्रा में वृद्धि होगी । पोषक तत्वों के समन्वित प्रयोग को अपनाना उत्पादकता तथा उर्वरा शक्ति दोनों के लिए हितकर है ।

एकीकृत पौध पोषक तत्त्व प्रणाली ( आई पी एन एस )

एकीकृत पौध पोषक तत्त्व प्रणाली में अभिप्राय है कि लम्बे समय तक मिट्टी कि उर्वरता शक्ति को कायम रखना और संभवतः सुधारते हुए टिकाऊ खेती करना । अब यह निर्विवाद सत्य हों गया है कि कार्बनिक खादों के साथ-साथ रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग से न केवल अधिकतम उपज ली जा सकती है , बल्कि लम्बे समय तक इनके प्रयोग से मृदा के उर्वरता के स्तर में भी सुधार होता  है । मुख्य पोषक तत्वों के अलावा गौड़ और सूक्ष्म पोषक तत्वों कि कमी नहीं होती एवं उर्वरक उपयोग क्षमता से वृद्धि के साथ-साथ आर्थिक दृष्टि से किसान के हित में है ।

एकीकृत पौध पोषक तत्त्व प्रणाली के घटक :

 रासायनिक उर्वरक , कार्बनिक खादें , हरी खाद , फसल अवशेष और उर्वरक एकीकृत पौध पोषक तत्त्व प्रणाली के प्रमुख घटक है ।

रासायनिक उर्वरक :

 रासायनिक उर्वरक  आई पी एन एस का महत्वपूर्ण घटक है । वर्तमान में उर्वरकों का घरेलु उत्पादन उतना नहीं है कि बढ़ती हुई आवश्यकता कि पूर्ति कर सके और भविष्य में ऐसी स्थिति नहीं दिखाई दे रही है । साथ ही वर्तमान बदलती आर्थिक परिस्थितियों में केंद्र सरकार उर्वरकों का आयत कर मांग और पूर्ति के अंतर को पुअर करने कि स्थिति में नहीं है । अतः इस अंतर कि पूर्ति के लिए उपलब्ध उर्वरकों की क्षमता में वृद्धि , कार्बनिक खादों का प्रयोग  और जैव उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा देना होगा ।

फसल का नाम हरे पदार्थ की मात्रा
( टन / हैक्टेयर )
नाइट्रोजन का प्रतिशत प्राप्त नाइट्रोजन
( किग्रा / हैक्टेयर )
सनई 20-30 0.43 86-129
ढाँचा 20-25 0.42 84-105
उर्द 10-12 0.41 41-49
मूंग 8-10 0.48 38-48
ग्वार 20-25 0.34 68-85
लोबिया 15-18 0.49 74-88
कुल्थी 8-10 0.33 26-33
नील 8-10 0.78 62-78

धान :

 कृषि जलवायु प्रखंड के अनुसार प्रजातियां :

 असिंचिंत दशा में (शीघ्र पकने वाली) : 100-120 दिन नरेंद्र लालमता, शुष्क सम्राट, गोविन्द, नरेंद्र -97, नरेंद्र -118, अशिवनी, वारानी दीप

सिंचित दशा में (शीघ्र पकने वाली) : मालवीय धान-2, गोविन्द, मनहर, नरेंद्र -80, पंत -12 साकेत -1 नरेंद्र -118, आई आर  -36 आई आर-50

सिंचित दशा में( मध्यम अवधि में पकने वाली ) : 120-140 दिन, पंत 10, पंत-4 सरजू -52, नरेंद्र -2026-2064, पूसा -44 , पी एन आर 381, मालवीय 36

सुगन्धित धान : मालवीय सुगंध -105 , नरेंद्र सुगंध, टा -3, पूसा बासमती -१ हरियाणा बासमती -1, टा -3 बासमती -370 , कस्तूरी तरवारी बासमती

ऊसरीली भूमि : साकेत -4, नरेंद्र ऊसर धान -1,2 व 3, सी , एस, आर , 10 नरेंद्र ऊसर धान -2008 व 2009 लकड़ा

संकर प्रजातियां : पंत संकर धान -1, नरेंद्र संकर धान -2, पी एच वी 71, प्रो। एग्रो 6444, पूसा आर एच 10, नरेंद्र ऊसर संकर धान -3 आर एच 1531

निचले व जल भराव वाले क्षेत्र हेतु : जल लहरी , मधुकर , महसूरी, जलप्रिया , जलनिधि , नरेंद्र जल पुष्प जलमग्न

बीज की दर : रोपाई के लिए : 30-50 कि ग्राम  प्रति हेक्टर

सीधी बुवाई के लिए : 75-80 कि ग्राम प्रति हेक्टर हल के पीछे एवं 100 से 120 किग्रा प्रति हेक्टेयर कि दर से छिटकवाँ बुवाई में आवश्यक होती है

बीजोपचार : 188 ग्राम जिंक सल्फेट तथा 20 ग्राम एग्रोमैसीन या 40 ग्राम एगलाल , 45 ली पानी के घोल में 25 किग्रा  बीज को रात भर भगोना चाहिए

धान

 धान की पौध : एक हेक्टेयर धान की रोपाई के लिए 800 से 1000 वर्ग मीटर क्षेत्र की पौधे  पर्याप्त होगी । इसके लिए 12 से 14 किलोग्राम एन. पी. के. 12:32:16 तथा 10-12 किलोग्राम यूरिया प्रयोग करना चाहिए । यदि आवश्यकता हो तो जिंक सल्फेट मोमो हाईड्रेट  33% जिंक 5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बुवाई के पहले खेत में मिलाना चाहिए

बुवाई का समय :

पौधे : मई के अंतिम सप्ताह से मध्य जून तक

रोपाई : जून के तीसरे सप्ताह से मध्य जुलाई तक करना चाहिए

सीधी बुवाई : जून का दूसरा पखवाड़ा उपयुक्त रहता है

दुरी : धान की अच्छी पैदावार लेने के लिए पंक्ति से पंक्ति की दुरी २० सेमी तथा पौधे से पौधे  की दुरी १०-१५ रखना चाहिए । प्रत्येक स्थान पर २ से ३ पौधे लगाना लाभप्रद रहता है

उर्वरको  का प्रयोग : उर्वरको  का प्रयोग मिटटी जांच के आधार पर ही करना उपयुक्त है यदि किसी कारणवश मिटटी परिक्षण नहीं हो सका तो प्रति हेक्टेयर पोषक तत्वों का प्रयोग निम्न मात्रा में करना चाहिए

गेहूं

प्रजातियां :

असिंचित दशा में :

यु पी 2338, पी वी डब्लू  175, के 9465 (गोमती ), के 8027 (मगहर) , के 8962 (इंद्रा ), एच यू डब्लू  533 डब्लू  एच 147

सिचित दशा में :

यु पी 2338, यु पी 2382 , यु पी 2003 , डी एम 784-3,( वैशाली ) के 9107 (देवा) , मालवीय 206 एच पी 1734 (राजलक्ष्मी) के 9006 (उजियार ), एन डब्लू  1012 एच । पी 1761 एच यू डब्लू  468 एच डी 2733 पी वी डब्लू  343  के 88 पी बी डब्लू  542, पी बी डब्लू  550 पी बी डब्लू  590 डी बी डब्लू  16

सिंचित दशा में (विलम्ब से बुवाई ):

 एच. आई. 784 एच. डी. 2285, एच. पी. 1209 , मालवीय 234,  एच. पी. 1633 (सोनाली)  एच. पी. 1744 , एन. डब्ल्यू.  1014 (नरेंद्र) के. 8020 (त्रिवेणी ), एच. डी. 2643 (गंगा ) , के. 1962 (गंगोत्री ), पी. वी. डब्ल्यू  373 डी. बी. डब्ल्यू 16 डी. बी. डब्ल्यू. 17, उननत हलना , एन. डब्ल्यू. 2036 के. 307 एवं के. 9533

उसरीली भूमि:

 के. आर. एल. 1-4, राज 3077 के. आर. एल. 19, के. 8434 (प्रसाद ) के. आर. एल. 210 एवं 213

उन्नतिशील कृषि विधियाँ

सिचित तथा सामान्य बुवाई की दशा में

बुवाई का समय : सामान्य : देर से पकने वाली प्रजातियां की बुवाई नवम्बर के द्वितीय पक्ष शीघ्र पकने वाली जातियों की बुवाई दिसंबर में उपयुक्त रहती है

बीज की मात्रा : १०० कि ग्राम बीज प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए। देर से बोने के लिए बीज कि मात्रा को १२५ किलोग्राम कर देना चाहिए

बीज शोधन : यदि बीज प्रमारित न हो तो २।०० ग्राम कप्तान या २।५ ग्राम थीरम प्रति किग्रा बीज की दर से अच्छे जमाव के लिए बीज शोधन हेतु प्रयोग करे । जहाँ अनावृत कडुवा की समस्या हो वहां कार्बेन्डाजिम (यामाटो)२।५ ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से प्रयोग किया जाये

दूरी : पंक्तियों की दूरी १८ से २२ से मी एवं बीज की गहराई ५-६ से मी रखना चाहिए

उर्वरको की मात्रा एवं प्रयोग विधि: सामान्यतया मृदा परीक्ष के आधार पैर उर्वरको का प्रयोग करना चाहिए १० से १२ टन कम्पोस्ट की खाद डालना भी आवश्यक है ।  बौनी जाती के गेहूं में सामान्य तौर पैर १५० कि ग्रा नत्रजन ८० कि ग्रा फास्फोरस एवं ५० कि ग्रा पोटाश प्रति हेकटेयेर प्रयोग करना चाहिए । इसके लिए ९५ कि ग्रा  एन पी के (१२:३२:१६) एवं १५० कि ग्रा यूरिया एवं २५  कि ग्रा एम ओ पी प्रति हेक्टयर कि दर से प्रयोग कर पूरा किया जा सकता है उर्वरको कि पूरी मात्रा बुवाई के समय चोंगे या सीड कम फर्टिलाइज़र ड्रिल द्वारा प्रयोग करना चाहिए

समय कि विधि : एन पी के (१२:३२:१६) कि सम्पूर्ण मात्रा बुवाई के समय कूडो में चोंगा या सीड कम फर्टिलाइज़र ड्रिल द्वारा देने से अधिक उपज प्राप्त होती है यूरिया कि मात्रा को दो बराबर भागो में २०-२१ दिन तथा ८०-८५ दिन पैर सिचाई के बाद प्रयोग करना चाहिए | यह ध्यान रहे की किल्ले निकलने के बाद प्रति वर्ग मीटर बलियो की संख्या 400-500 तक मिल जाये

सिचाई : सामान्य गेहु की बौनी जातियो के लिए फसल को 6 सिचाई की आवश्यकता पड़ती है जिनको निम्न आवश्यकता पड़ती है | जिनको निम्न अवस्थाओ पर देना चाहिए देर से बुवाई की दशा मे पहली सिचाई 15 दिन पर तटपचयत अपेक्षक्राट जल्दी जल्दी सिचाई करे माध्यम है इनको बिवाई भूमि मे 4 सिचाईया देकर भी अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है इनको बिवाई के 20-25 , 45-50 , 80-85 तथा 100-105 दिन बाद करना अच्छा होता है प्रदान किए गए उर्वरकों का मुश्किल से ३०-४० प्रतिशत भाग ही फसल द्वारा उपयोग किया जाता है। शेष मात्रा विभिन्न रास्तों में जैसे लीचिंग,बहाव,वाष्पीकरण,मृदा कटाव ,डिनाइट्रीफकेशन , स्थिरीकरण आदि के द्वारा मृदा से नस्ट हो जाता है।

कार्बनिक खाद्ये:

कार्बनिक खाद्ये जैसे गोबर की खादें,कपोस्ट खाद्य,परम्परागत रूप से मृदा की उर्वरा शक्ति में बृद्धि कर फसलों से अच्छी पैदावार लेने के लिए उपयोग किए जाते है,यह बात भी सिद्ध हो गई है कि रासायनिक उर्वरको के साथ कार्बनिक खादों का संतुलित उपयोग  अकेले रासायनिक उर्वरक या कार्बनिक खादों के उपयोग के बजाय उपज कि दृष्टि से अधिक प्रभावी रहा है।

दलहनी फसलें:

दलहनी फसलों कि जड़ों में बनी ग्रंथियों में जीवाणु पाये जाते  है। जो वायुमंडल कि नाइट्रोजन को मृदा में स्थिर कर मृदा उर्वरा शक्ति में बृद्धि करते है। विभिन्न दलहनी फसलें नाईट्रोजन की  विभिन्न  मात्राएँ मृदा के अंदर छोड़ती है। जो अगली फसल के काम आतीं है। चारे वाली दलहनी फसल दाने वाली दलहनी फसलों की अपेक्षा मृदा में अधिक मात्रा में नाइट्रोजन  छोड़ती है। औसतन ५०-६० कि ग्रा नाइट्रोजन अगली फसल को मिल जाती है।

हरी खाद:

हरी खाद के प्रति भी किसानों को दिलचस्पी लेनी होगी।यह नाईट्रोजन को मृदा में स्थिर करती है। वही दूसरी ओर इनके मृदा में सड़ने से मृदा को कार्बनिक पदार्थ मिलता है। जिससे मृदा के  भौतिक और रासायनिक गुणों में सधार होता है। मृदा का कार्बन नाईट्रोजन अनुपात सुधारता है। लाभकारी सुक्ष्म मृदा जीवाणुओ की सक्रियता आती है।

फसल अवशेष:

भारत में फसल अवशेष काफी मात्रा में उपलब्ध है।फसल अवशेष चारे के रूप में जानवरों के लिए भोजन का सहारा भी है।अतः इन्हें रासायनिक उर्वरकों का पूरक स्रोत नहीं माना जा सकता, लेकिन जिन भागो में फसल कटाई मशीन द्वारा होती है।वहां पर्याप्त मात्रा में फसलों में अवशेष खेतों में पड़ें रह जाते है,जो की पोषक तत्त्व प्रदान करने का साधन बनते है।आलू, गन्ना आदि कुछ ऐसी फसलें है जिनसे पर्याप्त मात्रा में फसलें अवशेष व्यर्थ नष्ट जाते है।

जैव उर्वरक:

नाईट्रोजन तत्त्व की पूर्ति पौधों को तीन स्रोतों से होती है। रासायनिक उर्वरक,जीवांश खाद जैव उर्वरक। एकीकृत  पौधों पोषक तत्वों प्रणाली पर इफको द्वारा प्रत्येक क्षेत्रीय कायार्लय के अंतर्गत ट्रायल आयोजन किये जा रहे है।

मृदा स्वास्थ्य सुधार का महत्व

  1.  मिट्टी के उपजाऊ शक्ति में हुई कमी को दूर कर उसे बनाए रखना
  2. प्रति इकाई क्षेत्रफल में उत्पानद बढ़ाना
  3. किसानो के आर्थिक लाभ में बृद्धि कराना

बढ़ती हुई जनसँख्या एवं  घटते कृषि क्षेत्र एवं   प्राकृतिक संसाधनों की दशा में फसल सघनता एवं उत्पादकता में बृद्धि द्वारा ही खाद्यान्न सुरक्षा बरकरार रह सकती है। विगत वर्षो में उर्वरको के असंतुलित और कार्बनिक खाद्यो के नगण्य प्रयोग के कारण भूमि की उर्वरा शक्ति और फसल-उत्पादकता में कमी आने लगी है।भूमि  में बहुपोषक तत्वों की  कमी स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ने लगी है। विभिन्न अनुसंसाधनो एवं मृदा  परिक्षण  से  प्राप्त परिणामो के अनुसार क्रमशः नाइट्रोजन में ६३ , फास्फोरस में ४२, पोटाश में ३७,गंधक में ४१,ज़िंक में ४९ और बोरान में ३३ प्रतिशत मृदा नमूनों में कमी के  संकेत मिले है।

अतः मृदा-स्वास्थ्य  सम्बर्थन एवं फसल उत्पादकता पोषक बृद्धि  हेतु सर्वोत्तम उर्वरक प्रबंधन तकनीक अपनाकर उर्वरको की उपयोग क्षमता बढ़ाने के लिए विशेष प्रयास की आवश्यकता है।  उर्वरको के साथ ही वैकल्पित संसाधनों के उपयोग  को विशेष महत्व देना होगा

मृदा स्वास्थ्य  संवर्धन के वैकल्पित संसाधनों का उपयोग

 कार्बनिक खाद्य व  हरी का खाद्य  का प्रयोग : हरी खाद्य  ,गोबर की खाद्य  ,कम्पोस्ट खाद्य  ,पशुओं की बिछाली,खलियां इत्यादि भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के साथ-साथ भूमि का स्वास्थ्य ठीक करने में विशेष सहायक है। विभिन्न हरी खाद्यो की फसलों में पोषक तत्व निम्न मात्रा में भूमि में उपलब्ध होता है।